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समेत शिखरजी भावयात्रा

समेतशिखरजी भावयात्रा

बोलिए श्री समेत शिखर पारसनाथ भगवन की जय…

बोलिए श्री समेतशिखर अधिष्टायक भोमिय देव की जय…

अपने अपने घर में पार्श्वनाथ प्रभु या समेत शिखर तीर्थ के फोटो को अपने सामने रखते हुए धुप दीप प्रकटा दीजिये अगर फोटो नहीं है तो अपने घर के मंदिर में धुप दीप प्रकटाकर एक आसन के ऊपर या खुर्शी में सुखासन में अपना पूरा शरीर रिलेक्स करके ज्ञान या ध्यान मुद्रा में अपनी आँखों को बंध करके बैठे | अब यहाँ से जो कुछ भी बोला जाता है वो सभी का अपनी तीसरी आँख के सामने होता हुआ देखे और अपने पुरे तन और मन के साथ उत्कृष्ट भक्ति भाव से अब हम अपनी भाव यात्रा शुरू करते है |

धीरे धीरे श्वास लेते और छोड़ते हुये हमारा पुरा शरीर हलका हलका हो रहा है … हो रहा है… हो रहा है …. ३ बार करे |

अब हम पूरी तरह हलके होकर अपने मन और आत्मा के साथ समेत शीखरजी की और आकाश मार्ग से जा रहे है हमारी अन्दर की ये अद्भुत शक्ति से अब हम आकाश मार्ग से होकर सीधे सब से पहली टुंक के आगे पहोच गए है

जिनका नाम है गौतम गणधर की टुंक

यहाँ सभी २४ तीर्थंकर और महावीर स्वामी के ११ गणधर को मिलकर कुल ३५ गंधार भगवंत की चरण पादुका है जिन्होंने जगह जगह जैन धर्म का प्रचार प्रसार करते हुए मोक्ष पद की प्राप्ति की हुई है उन सभी को भाव से वंदन करते हुए हम अब दूसरी टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे कुंथुनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

१. कुंथुनाथ भगवान की टोंक- इस टोंक का नाम ज्ञानधर कूट है। यहाँ से कुंथुनाथ भगवान के साथ एक हजार मुनियों ने अपने कर्मों का नाश कर मोक्ष प्राप्त किया था। इसके अलावा छियानवे कोड़ाकोड़ी, छियानवे कोटि, बत्तीस लाख, छियानवे हजार, सात सौ बयालिस अन्य मुनियों ने यहाँ से निर्वाण प्राप्त किया। भाव सहित इस टोंक के वंदन से एक कोटि उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे नमिनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

२. नमिनाथ भगवान की टोंक-इस टोंक का नाम मित्रधर कूट है। यहाँ से इक्कीसवे तीर्थंकर भगवान नमिनाथ ने एक हजार मुनियों के साथ मोक्ष प्राप्त किया था। इनके अलावा नौ सौ कोड़ाकोड़ी, एक अरब, पैंतालिस लाख, सात हजार नौ सौ बयालिस मुनिगण सिद्ध अवस्था को प्राप्त हुए हैं। इस टोंक के वंदन से समस्त दुख-दारिद्र का नाश होता है। भाव सहित इस टोंक के वंदन से एक कोटि उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे अरहनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

३. भगवान अरहनाथ की टोंक-इस टोंक का नाम नाटक कूट है। यहाँ से अरहनाथ भगवान ने एक हजार अन्य साधुओं के साथ मोक्षपद प्राप्त किया था। इसी टोंक से निन्यानवे कोटि, निन्यानवे लाख एवं नौ सौ निन्यानवे अन्य साधुओं ने मोक्ष प्राप्त किया। भाव सहित इस टोंक के वंदन से छियानवे कोटि उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे मल्लीनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

४. श्री मल्लिनाथ भगवान की टोंक-इस टोंक का नाम सम्बल कूट है। यहाँ से भगवान मल्लिनाथ स्वामी ने पाँच सौ मुनियों के साथ मोक्ष पद को प्राप्त किया था। इनके अलावा छियानवे कोटि अन्य महामुनियों ने समस्त घातिया-अघातिया कर्मों का नाश कर सिद्धपद को प्राप्त किया था। भाव सहित इस टोंक के वंदन से एक कोटि प्रोषधोपवास (एक एकाशन, एक उपवास एवं फिर एक एकाशन) का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे श्रेयांसनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

५. भगवान श्रेयांसनाथ की टोंक-इस टोंक का नाम संकुल कूट है। यहाँ से श्रेयांसनाथ भगवान ने एक हजार मुनियों के साथ मोक्षपद प्राप्त किया था। इसी टोंक से छियानवे कोटा-कोटि, छियानवे कोटि, छियानवे लाख, नौ हजार पाँच सौ बयालिस अन्य मुनियों ने भी शिवपथ प्राप्त किया। भाव सहित इस टोंक के वंदन से एक कोटि उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे सुविधिनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

६. भगवान सुविधिनाथ की टोंक-इस टोंक का नाम सुप्रभ कूट है। यहाँ से भगवान सुविधिनाथ यानि पुष्पदंतनाथ ने एक हजार साधुओं के साथ मोक्ष प्राप्त किया था। यहीं से एक कोड़ाकोड़ी, निन्यानवे लाख, सात हजार, चार सौ अस्सी मुनियों ने भी मोक्ष पद को प्राप्त किया। भाव सहित इस टोंक के वंदन से एक कोटि उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे पद्मप्रभ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

७. भगवान पद्मप्रभ की टोंक-इस टोंक का नाम मोहन कूट है। यहाँ से भगवान पद्मप्रभ ने तीन सौ चौबीस मुनियों के साथ निर्वाणपद प्राप्त किया था। इसके अलावा यहाँ से निन्यानवे कोटि, सत्तासी लाख, तेतालिस हजार सात सौ सत्ताइस मुनियों ने मोक्ष प्राप्त किया। भाव सहित इस टोंक के वंदन से एक कोटि उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे मुनिसुव्रतनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

८. भगवान मुनिसुव्रतनाथ की टोंक-इस टोंक का नाम निर्जर कूट है। यहाँ से भगवान मुनिसुव्रतनाथ ने एक हजार साधुओं के साथ मोक्ष प्राप्त किया था। इनके अलावा निन्यानवे कोटाकोटि, सत्तानवे कोटि, नौ लाख, नौ सौ निन्यानवे मुनिराजों ने मोक्षपद को प्राप्त किया। भाव सहित इस टोंक के वंदन से एक हजार प्रोषध उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे चंद्रप्रभु भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

९. भगवान चन्द्रप्रभ की टोंक-इस टोंक का नाम ललित कूट है। यहाँ से चन्द्रप्रभु भगवान ने एक हजार मुनियो के साथ मोक्ष प्राप्त किया था। इनसे अतिरिक्त इस कूट से नौ सौ चौरासी अरब, बहत्तर कोटि, अस्सी लाख, चौरासी हजार, पाँच सौ पंचानवे साधुओं ने सिद्धपद को प्राप्त किया है। भाव सहित इस टोंक का दर्शन करने से छियानवे लाख उपवास का फल मिलता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे आदिनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

१०. भगवान आदिनाथ की टोंक-वास्तव में तो भगवान आदिनाथ ने कैलाशपर्वत से दस हजार मुनियों के साथ मोक्ष प्राप्त किया था लेकिन सम्मेदशिखर तीर्थ पर भी भगवान आदिनाथ की महिमाशाली टोंक बनी हुई है। िभाव सहित इस टोंक का दर्शन-वंदन करने से अनंत पुण्य का बंध होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे शीतलनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

११. भगवान शीतलनाथ की टोंक-इस टोंक का नाम विद्युत्वर कूट है। यहाँ से भगवान शीतलनाथ ने एक हजार साधुओं के साथ मोक्ष प्राप्त किया था। इनसे अतिरिक्त अट्ठारह कोड़ाकोड़ी, बयालिस कोटि, बत्तीस लाख, बयालिस हजार, नौ सौ पाँच मुनिगण मोक्ष सिधारे हैं। भाव सहित इस टोंक का दर्शन-वंदन करने से एक कोटि उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे अनंतनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

१२. अनंतनाथ भगवान की टोंक-इस टोंक का नाम स्वयंभू कूट है। यहाँ से अनंतनाथ भगवान ने मोक्ष प्राप्त किया था। उनके साथ सात हजार साधुओं ने भी अपने समस्त घातिया कर्मों का नाश कर मोक्ष प्राप्त किया था। यहाँ से छियानवे कोड़ाकोड़ी, सत्तर करोड़, सत्तर लाख, सत्तर हजार, सात सौ अन्य मुनियों ने मोक्ष प्राप्त किया था। िभाव सहित इस टोंक का वंदन करने से नौ करोड़ उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे संभवनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

१३. भगवान संभवनाथ की टोंक-इस टोंक का नाम धवल कूट है। यहाँ से भगवान संभवनाथ ने एक हजार मुनियों के साथ मोक्ष प्राप्त किया था। इसके अलावा यहाँ से नौ कोड़ाकोड़ी, बहत्तर लाख, बयालिस हजार पाँच सौ मुनियों ने मोक्ष प्राप्त किया। िभाव सहित इस टोंक का वंदन करने से बयालिस लाख उपवास का फल मिलता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे वासुपूज्य भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

१४. भगवान वासुपूज्य की टोंक-भगवान वासुपूज्य स्वामी ने चम्पापुर (मंदारगिरि) तीर्थ से छ: सौ एक साधुओं के साथ मोक्ष प्राप्त किया था। बारहवें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्यनाथ ही एक ऐसे तीर्थंकर हैं जिनके पाँचों कल्याणक एक ही स्थान अर्थात् चम्पापुर से हुए हैं। सम्मेदशिखर तीर्थ पर भी भगवान वासुपूज्य की टोंक बनी हुई है। भाव सहित इस टोंक का वंदन करने से अतिशायी सुख की प्राप्ति होती है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे अभिनंदन भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

१५. भगवान अभिनंदननाथ की टोंक-इस टोंक का नाम आनन्द कूट है। यहाँ से भगवान अभिनंदननाथ ने एक हजार मुनियों के साथ सिद्धपद प्राप्त किया था। इनके अलावा यहाँ से बहत्तर कोड़ाकोड़ी, सत्तर कोटि, सत्तर लाख, बयालिस हजार, सात सौ मुनियों ने मोक्षपद प्राप्त किया। भाव सहित इस टोंक का वंदन करने से एक लाख उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे धर्मनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

१६. भगवान धर्मनाथ की टोंक-इस टोंक का नाम सुदत्त कूट है। यहाँ से भगवान धर्मनाथ स्वामी ने आठ सौ एक मुनियों के साथ सर्व कर्मों का नाश करके निर्वाणपद प्राप्त किया था। यहाँ से उनतीस कोड़ाकोड़ी, उन्नीस कोटि, नौ लाख, नौ हजार, सात सौ पंचानवे साधुओें ने मोक्ष प्राप्त किया। भाव सहित इस टोंक का वंदन करने से एक कोटि उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे सुमतिनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

१७. भगवान सुमतिनाथ की टोंक-इस टोंक का नाम अविचल कूट है। यहाँ से भगवान सुमतिनाथ ने एक हजार साधुओं के साथ मोक्ष प्राप्त किया था। इसके अलावा एक कोड़ाकोड़ी, चौरासी कोटि, बहत्तर लाख, इक्यासी हजार, सात सौ इक्यासी मुनियों ने यहाँ से मोक्ष प्राप्त किया है। भाव सहित इस टोंक का वंदन करने से नव कोटि, बत्तीस लाख उपवास का सुफल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे शांतिनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

१८. भगवान शांतिनाथ की टोंक-इस टोंक का नाम कुन्दप्रभ कूट है। यहाँ से भगवान शांतिनाथ ने नौ सौ मुनियों के साथ मोक्ष प्राप्त किया था। इनके अलावा नौ कोटि-कोटि, नौ लाख, नौ हजार, नौ सौ निन्यानवे महामुनियों ने कठोर तपश्वरण करके मोक्ष प्राप्त किया था। भाव सहित इस टोंक का दर्शन-वंदन करने से एक कोटि उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे महावीर भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

१९. भगवान महावीर टोंक-कालदोष के कारण वर्तमान में भगवान महावीर स्वामी ने पावापुरी जल मंदिर (बिहार) से निर्वाणपद प्राप्त किया। सम्मेदशिखर में भी इनके चरणचिन्ह बने हुए हैं। इस टोंक का दर्शन-वंदन करने से सम्पूर्ण रोग, दुख-दारिद्र आदि का विनाश होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे सुपार्श्वनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

२०. भगवान सुपार्श्वनाथ की टोंक-इस टोंक का नाम प्रभास कूट है। यहाँ से सातवें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ ने पाँच सौ मुनियों के साथ मोक्ष प्राप्त किया था। इसके अलावा उनचास कोटि-कोटि, चौरासी कोटि, बत्तीस लाख, सात हजार, सात सौ बयालिस महामुनियों ने समस्त कर्मों का नाशकर शिवपद की प्राप्ति की थी। भाव सहित इस टोंक का दर्शन-वंदन करने से बत्तीस कोटि उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे विमलनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

२१. भगवान विमलनाथ की टोंक-इस टोंक का नाम सुवीर कूट है। यहाँ से भगवान विमलनाथ स्वामी ने छ: सौ मुनियों के साथ घातिया-अघातिया कर्मों का नाश कर सिद्धपद प्राप्त किया था। इसके अलावा सत्तर कोड़ाकोड़ी, साठ लाख, छ: हजार, सात सौ बयालिस मुनियों ने यहाँ से मोक्षपद प्राप्त किया था ।भाव सहित इस टोंक का दर्शन-वंदन करने से एक कोटि उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे अजितनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

२२. भगवान अजितनाथ की टोंक-इस टोंक का नाम सिद्धवर कूट है। यहाँ से भगवान अजितनाथ ने एक हजार महामुनियों के साथ मोक्ष प्राप्त किया था। यहाँ से एक अरब, अस्सी कोटि, चौवन लाख अन्य मुनियों ने भी निर्वाणपद की प्राप्ति की थी। भाव सहित इस टोंक का दर्शन करने से बत्तीस कोटि उपवास का फल प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे नेमिनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

२३. भगवान नेमिनाथ की टोंक-भगवान नेमिनाथ ने गुजरात प्रान्त में स्थित गिरनार पर्वत से शंबु, प्रद्युम्न आदि महामुनियों के साथ मोक्ष प्राप्त किया था। इनके अलावा गिरनार पर्वत से बहत्तर कोटि एवं सात सौ अन्य महामुनियों ने भी मोक्षपद प्राप्त किया। सम्मेदशिखर में भी भगवान नेमिनाथ की टोंक के दर्शन होते हैं। इस टोंक का दर्शन कर सभी भक्तजन अनंतगुणा पुण्य संचित करते हैं।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

वायुमय सूक्ष्म शरीर के कारन हम तुरंत ही पगदंडी पर से आकाश मार्गे पार्श्वनाथ भगवान की टुंक के पास पहोच गए है | भाव से दर्शन वंदन करते हुए ये टुंक के बारेमे जानते है

२४. भगवान पार्श्वनाथ की टोंक-इस टोंक का नाम सुवर्णभद्र कूट है। यह सम्मेदशिखर पर्वत की सबसे ऊँची एवं आखिरी टोंक है। यहाँ से तेईसवें तीर्थंकर भगवान पाश्र्वनाथ ने छत्तिस मुनियों के साथ मोक्ष की प्राप्ति की थी। चूँकि वर्तमानकाल में सम्मेदशिखर से मोक्ष प्राप्त करने वाले अंतिम तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ हैं अत: इस पूरे पर्वत को ‘पार्श्वनाथ हिल’ के नाम से ही जाना जाता है। यहाँ से अन्य बयासी कोटि, चौरासी लाख, पैंतालिस हजार, सात सौ बयालिस मुनियों ने समस्त कर्मों का नाश कर मोक्षपद प्राप्त किया। भाव सहित इस टोंक का वंदन करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है और सोलह कोटि उपवास का फल भी प्राप्त होता है।

अपने दोनों हाथ में अष्ट प्रकारी पूजा का सामान की कल्पना करते हुये हमारे अष्ट स्वरूप में हम प्रभु की पूजा ये दुहा को बोलते हुए करेंगे

ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमदे जिनेन्द्राय देवाधिदेवाय जलं, चन्दनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेधं, फलं यजामहे स्वाहा

भाव से अष्टप्रकारी पूजा चैत्यवंदन करके अब हम आगे की टुंक की और प्रस्थान करते है

तीर्थंकर भगवन्तों के गणधरों के मोक्ष का स्थान निश्चित नहीं है फिर भी सम्मेदशिखर तीर्थ की प्रथम गणधर टोंक पर समस्त गणधरों के चरणों के दर्शन होते हैं जिनके वंदन से भक्तजन असीम पुण्य का वर्धन करते हैं।

एक अद्भुत उर्जा की भावधारा का शरीर में अनुभव करते करते अब हम आकाशमार्ग से वापिस

अपने शरीर में आ गए है और हम एक अद्भुत उर्जा का अनुभव करते करते अब हम अपने दोनों हाथो की हथेलियों को एक दुसरे के साथ घिसने के बाद अपनी आँखों के ऊपर रखे और यात्रा की पूरी उर्जा का अपनी आंखोसे पुरे शरीर में अनुभव करे |

अब अपने हाथो को अपने ह्रदय के पास रखते हुए मनमे पञ्च परमेष्ठी भगवंत और अपने संघ देरासर के मुलनायक भगवन को नमन करते हुये हम नीचे मुजब की अनुमोदना करते है

“सर्व क्षेत्र के, सर्व काल के, सर्व भव्यात्मा जिन्होंने उत्तम माँ उत्तम भाव से समेतशिखर की यात्रा या भावयात्रा की हो, वर्तमान में कर रहे हो और भविष्य में जो करने वाले हो उन सभी की ये यात्रा की मन वचन और काया से भूरी भूरी अनुमोदना करता हु”

मेरी ये भाव यात्रा में जो कोई भी विधि आविधि हुयी हो तो उसकी मन वचन काया से मिच्छामी दुक्कडम कहेता हु और आज के आनंद और पुण्य की भूरी भूरी अनुमोदन करता हु

बोलिए श्री समेत शिखर पारसनाथ भगवन की जय…

बोलिए श्री समेतशिखर अधिष्टायक भोमिय देव की जय…