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18 पापस्थानक

🙏18 पापस्थानक…

🙏1. प्राणातिपात: हिंसा , कोई भी जीव के प्राण को घात करना , पीड़ा देना , मानसिक त्रास देना वो द्रव्य हिंसा है।रागादि भाव के साथ आत्मगुण को दबाना या घात करना वो भाव हिंसा है।

🙏2. मृषावाद: असत्य बोलना , छल , कपट , मान और माया जैसे मिथ्याभाव के साथ बोलना। धन , धान्य परिवार के लाभ या लोभ  के कारण असत्य वचन बोलना।  झूठी साक्षी देना।

🙏3. अदत्तादान: अदत्त – चोरी , आदान लेना। चोरी से छुपा के लेना। पूछे बिना लेना। राज्य के कर आदि छुपाना | एक परमाणु जितना चोरी करना भी अदत्तादान है।

🙏4. मैथुन: विषयभोग , काम वासना , इन्द्रियों का असंयम , पांचेय इन्द्रियों के भोगों की लोलुपता , विजातीय जाती की भोग वासना।

🙏5. परिग्रह: धन धान्यादि संग्रह करके उसमें मान , मोटाई , ममत्व करना। आवश्यक करके भी ज्यादा मिलने की तृष्णा।

🙏6. क्रोध: गुस्सा , आवेश , आक्रोश , अनादर और रीस।

🙏7. मान: अहंकार , अहं , अभिमान और आठ प्रकार के मद (जाती , कुल , बल , मान , तप , ज्ञान , रुप , ऐश्वर्य)।

🙏8. माया: छल , कपट , प्रपंच , मलिनता , माया , शल्य माने जाते है।

🙏9. लोभ: तृष्णा , असंतोष , लालच

🙏10. राग: मोह , ममता , आसक्ति और गारव

🙏11. द्वेष: ईर्षा , असूया ।

🙏12. कलह: झघडे , कजिया , कंकास करना।

🙏13. अभ्याख्यान: किसीको गलत आल चढ़ाना , आरोप करना।

🙏14. पैशुन्य: चाडी – चुगली करना।

🙏15. रति – अरति: हर्ष – शोक , खुशी – उद्धवेग

🙏16. परपरिवाद: पर की निंदा – कुथली करना।

🙏17. माया मृषावाद: माया से असत्य वचन बोलना। अन्य को छेतरनी बुद्धि से वचन बोलना।

🙏18. मिथ्यात्वशल्य: निदान , पर पदार्थ के सुख की अभिलाषा। विपरीत बुद्धि वो शल्य माना जाता है। सभी ग्रुप में भेजें जय जिनेन्द्र