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जैन धर्म में देवी अंबिका/मां अंबे

♦️जैन धर्म में देवी अंबिका/मां अंबे।♦️

कृष्ण राजा के शासन में,
सौराष्ट(गुजरात) के गिरनार पर्वत की तलेटी मे कुबेर नाम के गांव मे, एक घर मे सासु देवल ,पुत्र सोमभट्ट ,पुत्रवधु अंबिका और उनके दो छोटे बच्चे रहते थे।

पिता देवभट्ट ब्राह्मण के श्राद्ध के दिनों मे कौऔ को पिंड देना ,पीपल पानी चढाना आदि कार्य नित्य परंपरा से होते थे।

एक बार श्राद्ध के एक दिन ब्राह्मणो के लिये घर मे खिर आदि रसोई तैयार की गई थी,सासु कही बाहर थी,पति सोमभट्ट ब्राह्मणो को बुलाने गया था,
तभी 22वे तीर्थंकर नेमिनाथ भगवान के शिष्य, दो जैन मुनिभगवंत अंबिका के घर पधारे,

जैन धर्म पर अत्यंत श्रद्धा वाली बहु अंबिका ने, अत्यंत हर्ष और श्रद्धा के साथ ,श्राद्ध की रसोई मुनिभगवंतो को भिक्षादान कर दी।,

पडौशी ने जब यह देखा तो आग बबुला हो गई ,सासु के कान भरे ,सासु और पति सोमभट्ट ने सभी पडौशियो के सामने अंबिका को इतना धिक्कारा ,कि अंबिका को दोनो पुत्रो के साथ घर छोड़ना पडा।
तीर्थंकर नेमिनाथ की शरण स्वीकारने चलते – चलते वह गिरनार पर्वत की तरफ बढ़ी।
कुछ देर बाद,अत्यंत गर्मी और थकान महसूस कर, छोटा बच्चा प्यास से पीडित होकर पानी-पानी कहकर रोने लगा,दुसरा बच्चा भूख से पीडित होकर खाने के लिये रोने लगा
अंबिका ने अपने पुत्रो की पीड़ा देखकर प्रभु नेमिनाथ को याद किया,तभी उसे सरोवर,और आम का पेड़ दिखा,अंबिका के मन मे प्रभु नेमिनाथ के प्रति श्रद्धा तीव्र हो गई।
उधर घर पर सासु ने जब दुबारा रसोई बनाने के लिये बर्तन खोले तो बर्तन सोने के और भोजन से भरे हुए हो गये थे।
साथ ही आकाशवाणी हुई की जिस अंबिका का तुमने तिरस्कार किया है, वह साधु भगवंतो को अतिभाव पूर्वक भिक्षादान के पुण्य से देवियों और देवताओं द्वारा पुज्य अधिष्ठायक देवी बनने वाली है,
चमत्कार और आकाशवाणी सुनकर सासु ने पुत्र सोमभट्ट को बहु को ढुंढकर वापिस घर लाने को कहा।
सोमभट्ट पत्नि अंबिका को ढुंढते हुए गिरनार पर गया ,वहा अंबिका को दूर से देखकर पुकारा,
अंबिका ने सोचा कि सोमभट्ट उसे मारने आया है,सोमभट्ट के डर से उसने अंतिम समय मे अरिहंत ,सिद्ध,साधू और जैन धर्म को याद करते हुए कुएं मे दोनो पुत्रो के साथ कुदकर मृत्यु को शरण हो गई,
तीर्थंकर नेमिनाथ और जैन धर्म पर अत्यंत श्रद्धा के कारण मरकर वह व्यंतर लोक मे देवी-देवताओ के बीच पुजनीय देवी के रूप मे उत्पन्न हुई,दोनो पुत्र भी साथ मे देव बने,
पति सोमभट्ट पश्चाताप कर उसी कुएं मे कुद गया और मरकर   अंबिका देवी (मां अंबे) का सिंहरूप मे वाहन देव बना .

अवधिज्ञान से पुर्वभव जानकर देवी अंबिका प्रभु नेमिनाथ के दर्शन करने गिरनार पर पहुंची तो तभी वहां प्रभु नेमिनाथ का केवलज्ञान कल्याणक हुआ था ,देवताओ ने दिव्य समोवसरण की रचना की थी जहां बैठकर प्रभु नेमिनाथ धर्म की देशना दे रहे थे।तब इन्द्रदेव ने अंबिका देवी को धर्म की रक्षक अधिष्ठायिका देवी के रूप मे घोषित किया था।
जैन धर्म में मां अंबे को तीर्थंकर नेमिनाथ की शासनदेवी की रुप में प्रणाम किया जाता है।

।।जय नेमिनाथ।।
।।जय अंबे।।